संपादक की पसंद

फ्रेंच भाषी देश में हिंदी पत्रिका का जादू।

मॉरीशस में हिंदी पत्रिका इंद्रधनुष हिंदी भाषियों के लिए उनकी मातृभाषा का संवाहक बना।

मॉरीशस एक ऐसा देश जो अपने खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है इस देश के बारे में सबसे अहम बात यह है कि यहां भी एक भारत बसता है।जिस देश में बोलचाल की भाषा फ्रेंच हो और सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी वहां हिंदी की पत्रिका अगर देखने को मिल जाए तो वाकई हैरत की बात है। ऐसा सम्भव हुआ है मॉरीशस के वरिष्ठ इतिहासकार और हिंदी, फ्रेंच के लेखक प्रह्लाद रामशरण की वजह से। पिछले तीन दशक से वे ‘इंद्रधनुष’ पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हैं, जो फ्रेंच और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी प्रकाशित होती है।
मॉरीशस में फ्रेंच या स्थानीय भाषा क्रियोल बोली जाती है । भारत से 5 हज़ार किलोमीटर से भी दूर इस देश में लम्बे समय तक फ्रांस और ब्रिटेन का शासन रहा। ऐसी जगह ये पत्रिका हिंदी का अलख जगाने का प्रयास कर रही है। खुद प्रह्लाद जी भी मानते हैं कि इस टापू पर पत्रिका का प्रकाशन आसान काम नहीं है। वे कहते हैं – आज मॉरीशस के लोग अपने महान पूर्वजों के तप और त्याग को भूल गए हैं। देश के इतिहास में उन महापुरुषों को उचित स्थान मिले और वे वास्तविक इतिहास लोगों के सामने आए यही ‘इंद्रधनुष’ का मकसद है। इस पत्रिका में साहित्य और इतिहास से जुडी रचनाएँ प्रकाशित होती हैँ। हर अंक विशेषांक होता है। इंद्रधनुष का प्रकाशन दिसम्बर 1988 में शुरू हुआ था। शुरू में 13 वर्ष तक इसे सिर्फ हिंदी में प्रकाशित किया जाता था। अब इसे फ्रेंच और अंग्रेजी में भी प्रकाशित किया जाता है। खास बात ये है कि किसी भी लेख को एक ही पत्रिका में तीनो भाषाओं में पढ़ा जा सकता है।
सीमित साधनों के बावजूद ये पत्रिका अपने मकसद में कामयाब है। ये कहना गलत नहीं होगा कि विस्मृत हिंदी सेवकों, साहित्यकारों और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों का समग्र मूल्यांकन करके मॉरीशस साहित्यक और सांस्कृतिक जगत में उन्हें उचित स्थान दिलाया है। ठोस प्रमाणों और दस्तावेजों के आधार पर ‘इंद्रधनुष’ ने उन देश भक्तों के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डाला जिन्हे समाज ने बिल्कुल भुला दिया था। पत्रिका के प्रकाशक मंडल को जब महसूस हुआ कि ‘इंद्रधनुष’ की बहु उपयोगी सामग्री से अंग्रेजी और फ्रेंच भाषी वंचित हो रहे हैं तो साल 2000 से इसे त्रिभाषी बना दिया गया। इससे दूसरी भाषाओँ और संस्कृतियों के लोगों के साथ आपसी विचार विनिमय का मार्ग खुल गया। मॉरीशस के बहुभाषी ,बहुसांस्कृतिक और बहुजातीय समाज के विरोधाभासों को दूर करने में भी कुछ मदद मिली।

मॉरीशस में डॉ मगनलाल मणिलाल ने 15 मार्च 1909 में ‘हिंदुस्तानी’ नाम से समाचार पत्र प्रकाशित कर के हिन्दू जागरण का बीज बोया था। इसी अखबार के जरिये इस देश में हिंदी पत्रकारिता की नींव पड़ी। शुरू में ‘हिंदुस्तानी ‘ अंग्रेजी ,गुजराती में निकलता था 1910 से वह अंग्रेजी, हिंदी में निकलने लगा। हिंदुस्तानी के किस अंक से या किस तारीख से इस अखबार में हिंदी का प्रयोग हुआ यह बताना तो मुश्किल है वजह है हिंदुस्तानी का फाइल कहीं उपलब्ध नहीं है। मॉरीशस सरकार के दस्तावेज में जरूर इस बात का उल्लेख है कि 1910 से हिंदुस्तानी का प्रकाशन अंग्रेजी में होने लगा था। हिंदुस्तानी का 1913 का एक अंक मॉरिशस के अभिलेखागार में सुरक्षित है। इसमें हिंदी की एक कविता और एक लेख प्रकाशित है। दोनों होली महोत्सव से सम्बन्ध रखते हैं। यही वजह है कि इसी अंक को हिंदी की पहली प्रकाशित सामग्री भी मान लिया गया है।
डॉ मणिलाल ने जिस हिंदी आंदोलन का सूत्रपात मॉरीशस में किया था, उसका विकास 1920 में हुआ था। एक दशक तक यहाँ हिंदी , अंग्रेजी संस्करण के दैनिकों का प्रकाशन हुआ आगे चलकर दो साप्ताहिक पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इसी दौरान हिंदी भाषा में करीब बारह पुस्तकें लिखी गईं। ‘मॉरीशस का इतिहास ‘ जैसा ग्रन्थ प्रकाशित हुआ और ‘शताब्दी अंक’ के बाद ‘दीपावली विशेषांक ‘ की परम्परा चली । यहाँ के इतिहासकार मानते हैं कि सही मायने में इस देश के पहले हिंदी साहित्यकार जयनारायण राय थे। हालांकि 1937 में लिखी उनकी 8 कविताओं और 3 कहानियों की खोज लम्बे समय बाद हुई। स्वयं प्रह्लाद रामशरण मानते हैं कि जयनारायण की रचनाओं पर खास काम नहीं हुआ। वे कवि और कहानीकार थे इस बात का उल्लेख काफी समय तक नहीं हुआ। 1941 के ‘जीवन संगनी एकांकी’ संग्रह का प्रकाशन करके वे इस देश के पहले नाटकार कहलाये। 1950 में ‘जनता’ साप्ताहिक अखबार का संपादन करके संपादक के रूप में उभरे और सन 60 में मॉरीशस में हिंदी भाषा का संक्षिप्त इतिहास लिखकर इतिहासकार की श्रेणी में आये थे।
‘इंद्रधनुष’ के पहले अंक में प्रकाशित सम्पादकीय को अगर गौर से देखे तो मॉरीशस में हिंदी को लेकर एक अलग तरह कि छटपटाहट नज़र आती है। इतिहासकार प्रह्लाद रामशरण ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए लिखा है कि ”हिंदी आंदोलन के जनक डॉ मणिलाल को लेकर हमने क्या किया है ? उनकी एक मूर्ति और एक छोटी जीवनी से हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए ? उनके पांच साल के संघर्षपूर्ण आंदोलन पर मोटी पुस्तक लिखी जा सकती है । अबतक हमने उनपर क्या लिखा है ? क्या उनकी जन्म शताब्दी महोत्सव मनाने की सुध हमें आई ? हमने उनके वंशजों को खोज कर यहाँ लाने की बात सोची ? उनके युग का इतिहास लिखने में हमारी कलम की नोक टूट गई है ? कब तक हम मणिलाल की उपलब्धियों को दफनाते रहेंगे ? कब तक उनके हिंदी आंदोलन को नकारते रहेंगे ? यही बात पंडित आत्माराम और डॉ शिव सागर रामगुलाम पर लागु है। इन्होने भी हिंदी को लेकर जो काम किया उसे भुलाया नहीं जा सकता ” मॉरीशस की आजादी के बाद से यहाँ अलग अलग संगठनों और संस्थाओं की तरफ से समय समय पर हिंदी में विशेषांक निकाले जाते रहे हैं। लेकिन इंद्रधनुष के प्रत्येक अंक के प्रकाशन के पूर्व शोध (रिसर्च ) की परम्परा ने ही इसे अब हारवर्ड विश्वविद्यालय में जगह दिला दी है। जहाँ फ्रेंच और भारतीय भाषा की ये पत्रिका स्वयं में अब एक शोध का विषय है।
भारत के गिरमिटियों की कहानियां पढ़ते-सुनते यही पाया कि कभी भारत के अभावग्रस्त लोगों को बहकाया गया था कि चलो मॉरीशस, ऐसा जादुई देश, जहां जिस भी पत्थर को पलटोगे, उसके नीचे सोना मिलेगा। भला ऐसा कहीं संभव है कि पत्थर के नीचे सोना छिपा हुआ हो, लेकिन इसे उनके कठिन परिश्रम का प्रतिफल ही कहेंगे कि जिस सपने को दिखाकर, ठगकर उन्हें यहां लाया गया, उन्होंने उसी सपने को साकार कर दिखाया। सबसे पहले तो उन्होंने आजादी की जंग छेड़ कर मॉरीशस को अपने नाम किया और फिर मॉरीशस को अपने खून-पसीने की कमाई से विश्र्व मानचित्र पर स्थापित कर दिया।
प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने कहा था ईश्र्वर ने पहले मॉरीशस बनाया फिर स्वर्ग की रचना की। मॉरीशस को देख कर मार्क ट्वेन के इस बयान की हकीकत सामने आ जाती है कि क्यों उन्होंने यह बयान दिया होगा। हरे-भरे लैंडस्केप, गर्व से माथा उठाये खड़ी पहाड़ियां, पहाड़ियों के बीच की दरारों से टकराती हुई समुद्री लहरें, सफेद चमकते हुए बालू वाले तट और लहलहाते नीले रंग के पानी का एक खूबसूरत कंट्रास्ट। समुद्र के किनारे खड़े होकर आप प्राकृतिक सौंदर्य की पराकाष्ठा के दर्शन कर सकते हैं। ऐसे देश में भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषा से जोड़ने में प्रह्लाद रामशरण जैसे लेखकों की भूमिका अतुलनीय है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button