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लचर नीति से फिर टूटा भाजपाइयों का मनोबल । लेखक : विकास सक्सेना

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर पाला बदल कर महागठबंधन के साथ सरकार बना चुके हैं। ‘‘गठबंधनभंग परम्परा’’ का पालन करते हुए भाजपा और जदयू एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में जुटे हुए हैं। इस सबके बीच राजनैतिक गतिविधियों पर अपनी पैनी नजर रखने वाले विश्लेषक बिहार में गठबंधन परिवर्तन का देश की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाने में सिर खपा रहे हैं। नीतीश कुमार के राजग से अलग होकर कांग्रेस के खेमे में शामिल होने से मोदी विरोधियों का मनोबल काफी बढ़ा हुआ है जबकि भाजपा समर्थकों को एक बार फिर नेतृत्व की लचर नीति से निराशा हाथ लगी है। वे समझ नहीं पा रहे कि उनके मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तुलना पीएफआई जैसे संगठन से करने वाले अधिकारी पर सख्ती न करने वाले दल के साथ सरकार चलाकर भाजपा नेतृत्व आखिर किसे संतुष्ट करने का प्रयास कर रहा था जबकि पिछले कई महीनों से नीतीश कुमार की गतिविधियां साफ संकेत दे रही थीं कि उनका और भाजपा का साथ ज्यादा लम्बा चलने वाला नहीं है। अगर भाजपा ने संघ के अपमान के सवाल पर खुद जदयू से नाता तोड़ लिया होता तो वे ज्यादा आक्रामकता के साथ नीतीश कुमार पर हमलावर होेते।
बिहार की राजनीति में पिछले काफी समय से भाजपा और जदयू के बीच राजनैतिक संबंध सहज नहीं चल रहे थे। राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद राजग से संबंध तोड़ने वाले नीतीश कुमार राजद से गलबहियां करते समय भूल गए कि उनकी राजनैतिक सफलता के पीछे सबसे बड़ी ताकत लालू यादव के जंगलराज के जवाब में उनकी सुशासन बाबू की छवि और भाजपा का राष्ट्रवाद है। लेेकिन वह ज्यादा समय तक लालू प्रसाद यादव के बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप को बर्दाश्त नहीं कर सके और कुछ महीने बाद ही भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में शामिल हो गए। लगता है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में जदयू के महज 45सीटों पर सिमट जाने से 71वर्ष के हो चुके नीतीश कुमार को अब अपने राजनैतिक भविष्य की चिंता सताने लगी। उन्हें अंदेशा है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी उम्र 74साल से ज्यादा हो चुकी होगी ऐसे में आयु और गिरती साख का हवाला देकर भाजपा की ओर से बिहार में नेतृृत्व परिवर्तन की कोशिश की जा सकती है। इसीलिए जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों को हवा देकर वह आए दिन भाजपा के ‘‘जाति से ऊपर हिन्दू एकता के एजेण्डे’’ को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे। इस साल रमजान के महीने में तेजस्वी यादव की ओर से आयोजित रोज इफ्तार की दावत में शामिल होकर उन्होंने अपनी आगामी योजना को सार्वजनिक भी कर दिया था, इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व आंखे बंद किए रहा। हद तो तब हो गई जब बीती 13जुलाई को पीएफआई के कार्यालय में चल रहे प्रशिक्षण शिविर से दो आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद पटना के पुलिस कमिश्नर मानवजीत सिंह ढिल्लो ने पीएफआई की तुलना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कर दी। भाजपाई तमाम विरोध के बावजूद ढिल्लो पर बड़ी कार्रवाई तो दूर उनका तबादला तक नहीं करा सके।
राजनैतिक विरोधियों द्वारा मौत का सौदागर, नीच और चोर जैसी तमाम स्तरहीन टिप्पणियों का समुचित जवाब न देने के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे अपने विरोधियों द्वारा फेंके गए पत्थरों के जवाब में उन पर पत्थर फेंकने के बजाए उन पत्थरों की सीढ़ी बना कर और अधिक ऊंचाई पर चढ़ने की नीति में विश्वास रखते हैं। अगर पिछले बीस साल के राजनैतिक घटनाक्रम को देखें तो उन्हें इस नीति का लगातार लाभ भी मिला है। लेकिन भाजपा को वैचारिक आधार प्रदान करने वाले संगठन और पार्टी कार्यकर्ताओं पर हुए हमलों के मामले में यह नीति आत्मघाती साबित हो सकती है। आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों से घिरे संगठन पीएफआई से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना उनकी सरकार के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा किए जाने से भाजपा कार्यकर्ताओं में उबाल आ गया था। वे मानवजीत सिंह ढिल्लो पर सख्त कार्रवाई चाहते थे लेकिन भाजपा के सहयोग के दम पर चल रही नीतीश सरकार ने ढिल्लो पर किसी तरह की सख्ती नहीं दिखाई। जदयू नेता नीतीश कुमार की गतिविधियां देखकर कोई सामान्य व्यक्ति भी सहज तौर पर अनुमान लगा पा रहा था कि वे ज्यादा समय तक भाजपा के साथ नहीं चलेंगे इसके बावजूद भाजपा के चाणक्य केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह दावा कर रहे थे कि भाजपा 2024 का लोकसभा चुनाव ही नहीं बल्कि 2025 का विधानसभा चुनाव भी जदयू के साथ मिलकर लड़ेगी। संघ की तुलना पीएफआई से करने वाले अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने वाली सरकार में शामिल रहने का भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका शीर्ष नेतृत्व ने ध्यान नहीं रखा।
बिहार में संघ के ‘अपमान’ के बावजूद सरकार में बने रहने के निर्णय से पहले भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या और अपमान पर भी भाजपा नेतृत्व के ढुलमुल रवैये से उसके कार्यकर्ता आहत हैं। उन्हें लगता है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह भाजपा कार्यकर्ताओं में हमले हुए, उनके घर जलाए गए, हत्याएं की गईं और कई महिला कार्यकर्ताओं के सामूहिक बलात्कार तक के मामले मीडिया की सुर्खियां बने लेकिन केंद्र सरकार ने कार्यकर्ताओं की जान, माल और सम्मान की सुरक्षा अपनी शक्ति का समुचित प्रयोग नहीं किया। भाजपा समर्थकों को अपनी सुरक्षा के लिए आसाम और दूसरे राज्यों में छिपना पड़ा। नेतृत्व की शिथिलता के कारण मुकुल रॉय, बाबूल सुप्रियो और अर्जुन सिंह समेत तमाम बड़े नेता और कार्यकर्ता भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इतना ही नहीं कई कार्यकताओं को भाजपा का साथ देने के ‘‘पाप’’ का प्रायश्चित करने के लिए तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने से पहले अपना सिर तक मुंडवाना पड़ा। इसी तरह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के लोगों को नागरिकता प्रदान करने वाले नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाहीन बाग जैसे अराजक प्रदर्शनों पर सरकार का नरम रूख भी भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की नाकाबंदी करके चलाए गए आंदोलन में खालिस्तानियों के शामिल होने की बात आए दिन भाजपा नेता कहते रहे लेकिन इसी आंदोलन के दौरान पश्चिम बंगाल की एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, सिंघू बार्डर पर एक युवक की नृशंस हत्या कर उसका शव बैरीकेड से लटका दिया गया। इतना ही नहीं 26जनवरी को अराजक आंदोलनकारियों ने लाल किले से तिरंगे को उतारकर उसकी जगह धार्मिक झण्डा फहरा दिया। लेकिन किसी भी मामले में आंदोलन के प्रमुख नेताओं पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह देश में कोरोना विस्फोट के जिम्मेदार तबलीगी जमात के मौलाना साद के खिलाफ भी बयानबाजी तो खूब हुई लेकिन तमाम एजेंसियां उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने में नाकाम साबित हुईं।
राजनैतिक विरोध को शत्रुता की हद तक ले जाने वालों के प्रति सदाशयता का प्रदर्शन कई बार समर्थकों और कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ देता है। भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव जीतने में सबसे बड़ी भूमिका पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की होती है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को समझना होगा कि किसी नेता पर की गई अभद्र टिप्पणी को तो विरोधियों के खिलाफ राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना आसान है लेकिन नीति, मातृसंगठन या कार्यकर्ताओं पर हुए हमले पर लचर रवैया कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ सकता है जिसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

(नोट:-यह लेखक के अपने विचार हैं । इससे संपादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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