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PM Narendra Modi : शहीद स्मारक पहुंचे पीएम मोदी, असम आंदोलन के शहीदों को दी श्रद्धांजलि

गुवाहाटी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को गुवाहाटी स्थित ‘शहीद स्मारक क्षेत्र’ में असम आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। असम आंदोलन विदेशी विरोधी आंदोलन था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्मारक क्षेत्र में स्थापित दीप के सामने पुष्पांजलि अर्पित की।

यह दीप 1979 से 1985 तक छह साल चले आंदोलन में शहीद हुए 860 लोगों की स्मृति में सदैव प्रज्वलित रहता है। करीब 20 मिनट के अपने दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने स्मारक परिसर का भ्रमण किया और शहीदों की याद में निर्मित दीर्घा को भी देखा, जहां शहीदों की आवक्ष प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

इस अवसर पर राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य, मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और असम समझौता कार्यान्वयन मंत्री अतुल बोरा प्रधानमंत्री के साथ मौजूद थे। स्मारक का उद्घाटन इसी महीने की शुरुआत में किया गया था और असम आंदोलन के पहले शहीद खड़गेश्वर तालुकदार की पुण्यतिथि भी उसी दिन थी। खड़गेश्वर तालुकदार का निधन 10 दिसंबर 1979 को हुआ था।

अतुल बोरा ने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री ने शहीदों के बारे में जानकारी ली और मुख्यमंत्री ने उन्हें इस संबंध में संक्षेप में बताया। उन्होंने कहा, ‘‘यह असम के लिए एक यादगार दिन है। प्रधानमंत्री ने उन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने कांग्रेस शासन के दौरान चले छह वर्षीय आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी थी।’’

बोरा ने बताया कि प्रधानमंत्री ने खड़गेश्वर तालुकदार की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) के अध्यक्ष बोरा ने कहा कि प्रधानमंत्री के इस दौरे के बाद पूरी दुनिया असम आंदोलन के बारे में और अधिक जानना चाहेगी।

उन्होंने कहा, ‘‘जब प्रधानमंत्री दीर्घा का दौरा कर रहे थे, तो वह शहीदों के बारे में विस्तार से जानना चाहते थे। इस तरह से अब तक किसी भी प्रधानमंत्री ने असम आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि नहीं दी थी। इसके लिए हम मोदी जी के आभारी हैं।’’

करीब 170 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस स्मारक में जलाशय, सभागार, प्रार्थना कक्ष, साइकिल ट्रैक और ध्वनि एवं प्रकाश शो की व्यवस्था जैसी सुविधाएं हैं। ध्वनि एवं प्रकाश शो के माध्यम से असम आंदोलन के विभिन्न पहलुओं और राज्य के इतिहास को प्रदर्शित किया जाएगा।

यह आंदोलन 15 अगस्त 1985 को असम समझौते पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ था। अवैध प्रवासन का मुद्दा असम के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में सबसे विवादास्पद विषयों में से एक रहा है। सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर राज्य में कई चुनाव लड़े गए हैं।

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